एमडीएच किंग धर्मपाल गुलाटी।

एमडीएच के मालिक धर्मपाल गुलाटी ने की थी 5वीं तक पढ़ाई, मात्र 1500 रुपये लेकर पाकिस्तान से भारत आए, तांगा भी चलाया, आज है करोड़ों की संपत्तिके मालिक। Always Right or Wrong.

संघर्ष की कहानी: तांगा चलाने वाले महाशय धर्मपाल गुलाटी कैसे बने गए “एमडीएच के मसाला किंग”?

महाशय धर्मपाल गुलाटी का नाम तो सुना ही होगा, जिन्हें लोग प्यार से “एमडीएच वाले दादा” या “मसाला किंग” भी कहते थे, भारतीय मसाला उद्योग के सबसे बड़े और चर्चित नामों में से एक रहे हैं। सफ़ेद दाढ़ी, सिर पर रंगीन पगड़ी, चेहरे पर मुस्कान और टीवी विज्ञापन में उनका संवाद होता था “असली मसाले सच-सच, एमडीएच एमडीएच” जो उन्हें घर-घर में पहचान दिलाता था। लेकिन उनके इस मुकाम तक पहुँचने की कहानी बहुत बड़े संघर्ष, मेहनत और ईमानदारी से भरी हुई है।

एमडीएच किंग धर्मपाल गुलाटी ।

गुलाटी का जन्म और बचपन का समय:- 

धर्मपाल गुलाटी का जन्म 27 मार्च 1923 को पाकिस्तान के सियालकोट में एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। उनके पिता महाशय चुन्नी लाल गुलाटी एक छोटे कारोबारी थे, जिन्होंने “महाशियां दी हट्टी” नाम से एक छोटी सी दुकान खोली थी। यही आगे चलकर एमडीएच ब्रांड की बहुत बड़ी नींव बनी। बचपन में धर्मपाल पढ़ाई में बहुत रुचि नहीं रखा करते थे और पाँचवीं कक्षा के बाद उन्होंने स्कूल जाना ही छोड़ दिया था।

उनका प्रारंभिक संघर्ष:- 

पढ़ाई छोड़ने के बाद से ही धर्मपाल ने विभिन्न काम को करने की कोशिश की। उन्होंने बढ़ई, पेंटिंग, चावल और कपड़े की दुकान पर काम करना, साबुन का व्यवसाय करना, लकड़ी का काम जैसे कई छोटे-मोटे काम भी किए, लेकिन किसी में उनका मन नहीं लगा। अंततः उन्होंने अपने पिता की मसालों की दुकान पर काम करना शुरू कर दिया था।

गुलाटी का बंटवारे का दौर और भारत आगमन होना:- 

वर्ष 1947 में भारत-पाकिस्तान बंटवारे के दौरान उनका परिवार सियालकोट छोड़कर भारत में आ गया था। शुरुआत में वे दिल्ली पहुंचे थे और करोल बाग के एक शरणार्थी शिविर में अपने परिवार सहित रहने लगे। परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद खराब थी; न कोई जमीन, न स्थायी घर और न ही स्थिर आय का कोई स्रोत था।

एमडीएच किंग धर्मपाल गुलाटी।

फिर शुरू हुआ तांगा चलाने का सफर:- 

भारत आने के बाद धर्मपाल गुलाटी के पास कोई नौकरी या व्यवसाय नहीं था। पिता से मिले मात्र 650 रुपये में से 650 रुपये का बड़ा हिस्सा खर्च करके उन्होंने 650 रुपये में एक पुराना तांगा और घोड़ा खरीद लिया। नई दिल्ली रेलवे स्टेशन और करोल बाग के बीच सवारी ढोना और समान ढोना, उनका पहला जीविका साधन बन गया था।

लेकिन धर्मपाल गुलाटी सिर्फ तांगा चलाने तक सीमित नहीं रहना चाहते थे। उनका मन फिर से मसालों के कारोबार में लगने लगा था। कुछ समय बाद ही उन्होंने तांगा बेचकर करोल बाग में एक छोटी सी मसाला दुकान किराए पर ले ली थी और अपना काम शुरू किया।

गुलाटी द्वारा एमडीएच की स्थापना और उसका विस्तार:- 

गुलाटी ने दुकान का नाम वही रखा – “महाशियां दी हट्टी” (एमडीएच)। शुरुआत में गुलाटी हाथ से मसाले पीसते और पैक किया करते थे। उनके मसालों की गुणवत्ता, शुद्धता और स्वाद ने जल्दी ही ग्राहकों का विश्वास जीत लिया था।

धीरे-धीरे व्यवसाय तेजी से बढ़ा और वर्ष 1959 में उन्होंने दिलशाद गार्डन, दिल्ली में एमडीएच मसालों का पहला कारखाना स्थापित कर लिया था। वहां से अलग-अलग मिश्रण वाले मसाले बड़े पैमाने पर तैयार होकर दिल्ली और आसपास के राज्यों में तेजी से भेजे जाने लगे थे।

एमडीएच किंग धर्मपाल गुलाटी।

ब्रांड पहचान और विज्ञापन

एमडीएच की सफलता का एक बहुत बड़ा कारण ग्राहकों से सीधा जुड़ाव का था। धर्मपाल गुलाटी खुद अपने ब्रांड का चेहरा बने। वे TV, रेडियो और प्रिंट विज्ञापनों में अपने उत्पादों का प्रचार भी किया करते थे। उनका संवाद “असली मसाले सच-सच” भारतीय परिवारों में मशहूर हो गया था।

उनकी पगड़ी, दाढ़ी और सादगी भरा व्यक्तित्व लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता था। वे खुद विज्ञापनों में आकर ग्राहकों से भरोसा पैदा किया करते थे, जो मार्केटिंग में एक मास्टरस्ट्रोक साबित हुआ था।

एमडीएच किंग धर्मपाल गुलाटी।

उनको मिले पुरस्कार और सम्मान:- 

धर्मपाल गुलाटी को कई पुरस्कार सम्मान के तौर पर मिले, जिनमें प्रमुख हैं –

  • वर्ष 2019 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया, जो व्यापार और उद्योग के क्षेत्र में योगदान के लिए था।
  • एफ़एमसीजी और व्यापार जगत के अन्य सम्मान के लिए।
  • उन्हें भारत के सबसे उम्रदराज CEO के रूप में भी जाना गया।
एमडीएच किंग धर्मपाल गुलाटी।

धर्मपाल गुलाटी का अंतिम समय व निधन:-

3 दिसंबर 2020 को 97 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ था। वे अपने पीछे न केवल एक विशाल और अरब रुपये का व्यवसाय छोड़कर गए, बल्कि ईमानदारी, मेहनत और सामाजिक सेवा की विरासत भी देश को समर्पित कर गए।

https://www.bhaskar.com/bhaskar-khaas/mega-empire/news/mdh-masala-revenue-vs-everest-dharampal-gulati-success-story-vadilal-shah-132937930.html

इसका निष्कर्ष:- 

महाशय धर्मपाल गुलाटी की कहानी इस बात का जीवंत उदाहरण बन गयी है कि मेहनत, ईमानदारी और दृढ़ संकल्प से कोई भी व्यक्ति अपनी किस्मत को बदल सकता है। तांगा चलाने से लेकर “मसाला किंग” बनने का उनका सफर न केवल समाज के लिए प्रेरणादायक है, बल्कि यह समाज को यह भी सिखाता है कि सफलता का स्वाद वही है जो सबके साथ बांटा जाता हो।

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