एशिया में अमेरिका की सुरक्षा नीति क्या है ?, एशिया को लेकर चीन-अमेरिका संबंधों पर क्या प्रभाव? (2025) जाने विस्तार से।
एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका और चीन के बीच अपने-अपने दबदबे की होड़ मची:-
परिचय:-
21वीं सदी को एशियाई सदी भी कहा जाता है। इसमें एशिया-प्रशांत क्षेत्र की रणनीतिक, आर्थिक और भू-राजनीतिक महत्वता दिन-प्रतिदिन लगातार बढ़ती जा रही है। एशिया-प्रशांत क्षेत्र में दुनिया की बहुत बड़ी जनसंख्या, तेज़ी से उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं, सामरिक जलमार्ग का होना और प्रचुर प्राकृतिक संसाधन बड़ी मात्रा में मौजूद हैं। ऐसे में देखा जाये तो अमेरिका और चीन; दोनों महाशक्तियां; इस क्षेत्र में अपने-अपने प्रभाव को ज्यादा-से-ज्यादा मजबूत करने की कोशिश में लगी हैं। इस प्रतिस्पर्धा को केवल भू-राजनीति तक सीमित नहीं किया जा सकता, बल्कि इसमें सैन्य, आर्थिक, कूटनीतिक, राजनीतिक, तकनीकी और वैचारिक स्तर पर भी टकराव बड़ी मात्रा में देखने को मिल रहा है।
इस क्षेत्र में चीन की रणनीति क्या है ?
1. चीन की Belt and Road Initiative का होना:-
चीन की सबसे महत्वाकांक्षी और सर्वोपरि योजना BRI है, जो एशिया से लेकर यूरोप होते हुए अफ्रीका तक के देशों को सड़क, रेल, बंदरगाह और आर्थिक गलियारों से जोड़ने की योजना पर काम चल रहा है। इसके अंतर्गत चीन ने अपने सभी पड़ोसी देशों जैसे: पाकिस्तान में CPEC, म्यांमार में बंदरगाह और श्रीलंका में हंबनटोटा पोर्ट जैसी परियोजनाएं पर काम शुरू किया है।
2. चीन का दक्षिण चीन सागर में बढ़ता विस्तारवाद:-
चीन ने अपने दक्षिण चीन सागर में कृत्रिम द्वीपों का निर्माण बड़े स्तर पर किया है ताकि वहां सैन्य ठिकाने बनाए जा सकें। वह पूरे दक्षिण चीन समुद्र को अपना क्षेत्र मानता है, जबकि चीन के पड़ोसी देश वियतनाम, फिलीपींस, मलेशिया, ब्रुनेई आदि देश भी इस क्षेत्र पर अपना दावा करते हैं। चीन की यह आक्रामकता क्षेत्रीय तनाव को तेजी से बढ़ा रही है।
3. चीन का बढ़ता आर्थिक प्रभाव और ऋण कूटनीति:-
चीन ने कई छोटे व आर्थिक रूप से कमजोर एशियाई देशों को ऋण देकर अपने प्रभाव में कर लिया है। इस ऋण जाल कूटनीति के चलते वह रणनीतिक संसाधनों और बुनियादी ढांचे पर अपना नियंत्रण लगातार हासिल कर रहा है।
4. चीन का बढ़ता प्रौद्योगिकी और साइबर प्रभुत्व:-
चीन ने Huawei और TikTok जैसी कंपनियों के माध्यम से तकनीकी क्षेत्र में भी अपनी स्थिति को मजबूत किया है। उसके 5G नेटवर्क और डेटा नियंत्रण करने से विश्व के अमेरिका समेत कई देश काफी चिंतित हैं।
चीन के प्रति अमेरिका की रणनीति क्या है ?
1. अमेरिका की इंडो-पैसिफिक अवधारणा पर एक नजर:-
अमेरिका ने हाल के वर्षों में इंडो-पैसिफिक शब्द को अपने रणनीतिक तौर पर भी अपनाया है, जो भारत को इस क्षेत्र में एक महत्त्वपूर्ण साझेदार के रूप में भी प्रस्तुत करता है। इसका उद्देश्य चीन के बढ़ते प्रभाव को कम करना है।
2. अमेरिका द्वारा बनाया गया QUAD (Quadrilateral Security Dialogue) संगठन:-
भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया की चतुर्भुज समूह (QUAD) को अमेरिका ने ही सक्रिय रूप से बनाया है। इसका उद्देश्य एक मुक्त, खुले और समावेशी इंडो-पैसिफिक व्यापार को सुनिश्चित करना है।
3. अमेरिका द्वारा सैन्य गठबंधनों का पुनर्गठन:-
अमेरिका वर्तमान में जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और फिलीपींस जैसे पारंपरिक सहयोगियों के साथ अपने सैन्य संबंधों को तेजी से मज़बूत कर रहा है। हाल ही में AUKUS समझौता (ऑस्ट्रेलिया-यूके-अमेरिका) भी चीन के बढ़ते प्रभुत्व को कम करने की रणनीति का हिस्सा है।
4. अमेरिका की आर्थिक और तकनीकी प्रतिस्पर्धा पर एक नजर:-
अमेरिका ने चीन के खिलाफ व्यापार युद्ध छेड़ा हुआ है, Huawei पर पाबंदियां भी लगाईं गईं और CHIPS Act के ज़रिए अर्धचालक उद्योग में आत्मनिर्भरता की नीति को भी बड़े स्तर पर आगे बढ़ाया है।
अमेरिका और चीन के बीच टकराव के प्रमुख क्षेत्र:-
1. दक्षिण चीन सागर और पूर्वी चीन सागर का महत्व:-
यह क्षेत्र दोनों देशों चीन और अमेरिका के बीच सैन्य तनाव का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। अमेरिका यहां Freedom of Navigation ऑपरेशन करता आ रहा है, जबकि चीन इसे लगातार चुनौती पेश करता है।
2. चीन की ताइवान पर नजर:-
ताइवान को लेकर चीन की बढ़ती आक्रामक नीति और अमेरिका की One China Policy के बावजूद उसकी सैन्य और कूटनीतिक मदद करना वर्तमान में सबसे बड़ा संघर्ष का मुद्दा बन चुका है। अमेरिका ने ताइवान को हथियार बेचने और राजनीतिक समर्थन देने में बढ़ोतरी की है।
3. दोनों देशों का तकनीकी क्षेत्र:-
5G, AI, साइबर सुरक्षा और अर्धचालक जैसे क्षेत्रों में अमेरिका और चीन के बीच स्पष्ट प्रतिस्पर्धा दिखाई देती है। अमेरिका चीन पर प्रौद्योगिकी ट्रांसफर और साइबर जासूसी के आरोप बहुत समय से लगाता चला आ रहा है।
4. दोनों देशों की नियम आधारित व्यवस्था बनाम प्रभुत्व की नीति का होना:-
अमेरिका हमेशा से ही एक नियम आधारित वैश्विक व्यवस्था की वकालत करता आ रहा है, जबकि चीन पर लगातार यहीं आरोप लगता है कि वह अपने हिसाब से नियम बनाता और बिगाडता है और संस्थानों का दुरुपयोग भी करता है।
दोनों देशों के लिए भविष्य की राह:-
1. दोनों देशों के बीच शीत युद्ध जैसा वातावरण:-
अमेरिका और चीन के बीच वर्तमान में चल रही प्रतिस्पर्धा लगातार नए शीत युद्ध जैसी होती जा रही है। हालांकि दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंध बहुत गहरे हैं इसलिए सीधा सैन्य संघर्ष अभी संभव नहीं लगता है।
2. अमेरिका और चीन के बीच छोटे देशों की चुनौती:-
चीन और अमेरिका की इस प्रतिस्पर्धा के बीच छोटे देशों को अपना संतुलन बनाने में परेशानी हो रही है छोटे देश जैसे: वियतनाम, इंडोनेशिया, लाओस आदि हैं। वे दोनों ही शक्तियों से लाभ लेना चाहते हैं लेकिन किसी के साथ खुलकर पूरी तरह से जुड़ने में बचते हैं।
निष्कर्ष
अमेरिका और चीन के बीच एशिया-प्रशांत क्षेत्र में दबदबे की होड़ केवल शक्ति प्रदर्शन मात्र नहीं है, बल्कि यह 21वीं सदी की विश्व व्यवस्था के स्वरूप को भी निर्धारित करती है। जहां देखा जाये तो चीन क्षेत्रीय प्रभुत्व और रणनीतिक विस्तार के रास्ते पर लगा हुआ है, वहीं अमेरिका लोकतांत्रिक मूल्यों और साझेदारी के ज़रिए अपनी पकड़ लगातार मजबूत बनाए रखना चाहता है। इस टकराव में क्षेत्रीय देशों की भूमिका महत्वपूर्ण और निर्णायक होगी। भविष्य में भारत जैसे देशों के लिए यह एक अवसर भी है और चुनौती भी है।
क्या होता है रेसिप्रोकल टैरिफ, जिसे अमेरिका ने भारत पर लगाया हुआ है?…. (2025)