भारत में खेती की जमीन की घटती उर्वरकता एक समस्या की ओर संकेत करती है। 2050 तक खेती में उर्वरकता होगी बहुत कम। जाने विस्तार से। Always Right or Wrong.
भारत में खेती की जमीन की घटती उर्वरकता भविष्य के लिए एक गंभीर चुनौती:-
भारत सदियों से एक कृषि प्रधान देश रहा है जहाँ देश की लगभग 60% आबादी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से खेती पर ही निर्भर है। लेकिन पिछले कुछ दशकों में कृषि भूमि की लगातार घटती उर्वरकता (soil fertility) में बहुत तेज से गिरावट आई है, जिससे न केवल फसल उत्पादन भी तेजी से प्रभावित हुआ है बल्कि किसानों की आय और देश की खाद्य सुरक्षा पर भी गंभीर संकट बना हुआ है। खेती की जमीन की घटती उर्वरकता का प्रमुख कारण अनियंत्रित रासायनिक उर्वरकों का तेजी से उपयोग होना, पारंपरिक पद्धतियों की उपेक्षा करना, जैविक पदार्थों की कमी होना और पर्यावरणीय असंतुलन का तेजी से बढ़ना शामिल है।
खेती की जमीन में उर्वरकता का घटना क्या है?
मिट्टी की उर्वरकता से तात्पर्य खेती की उस क्षमता से है, जिसके आधार पर मिट्टी पौधों को आवश्यकता यानि पोषक तत्व, जल एवं भौतिक वातावरण को प्रदान करती है ताकि वे अच्छी तरह से विकास कर सकें और अच्छी उपज दे सकें। अच्छी उर्वरकता वाली मिट्टी में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश, सूक्ष्म पोषक तत्व, जीवाणु और कार्बनिक पदार्थों की काफी अच्छी मात्रा देखने को मिलती है।
भारत में खेती की जमीन में तेजी से घटती उर्वरकता के मुख्य कारण:-
- रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का अत्यधिक इस्तेमाल होना:-
हरित क्रांति के बाद से ही भारत में उर्वरकों, मुख्यतः यूरिया, डीएपी और पोटाश का अत्यधिक उपयोग शुरू किया गया। शुरूआत में इससे फसल उत्पादन तेजी से बढ़ा, परंतु लम्बे समय तक इनका लगातार उपयोग मिट्टी की प्राकृतिक संरचना को तेजी के साथ नष्ट भी करने लगा। - खेती की जमीन में जैविक पदार्थों की अत्यधिक कमी का होना:-
पहले खेतों में गोबर, पत्तियाँ, हरी खाद आदि अच्छी मात्रा में डाले जाते थे जिससे मिट्टी को आवश्यक जैविक पदार्थ मिल सकें। अब ये परंपराएँ धीरे-धीरे समाप्त हो रही हैं जिससे मिट्टी की जीवंतता तेजी के साथ घट रही है। - एक ही फसल की बार-बार खेती होना (Monocropping):-
गेहूं-चावल चक्र जैसे एक ही प्रकार की फसल उगाने की बढ़ती प्रवृत्ति ने भी मिट्टी से खास पोषक तत्वों को खींचकर उसे नष्ट कर दिया है। विविधता न होने के कारण भी मिट्टी पुनर्जीवित नहीं हो पाती है। - अंधाधुंध सिंचाई का होना और जल निकासी की खराब व्यवस्था होना:-
जलभराव, क्षारीयता और लवणता जैसी समस्याएं खेतों की उर्वरकता को धीरे-धीरे नष्ट कर रही हैं। ट्यूबवेल के जरिए अधिक सिंचाई से भी जल स्तर नीचे हो रहा है और मिट्टी की गुणवत्ता पर भी इसका असर पड़ रहा है।
खेती में घटती उर्वरकता के मुख्य प्रभाव:-
- फसल उत्पादन में तेजी के साथ गिरावट:-
उर्वरकता की होती कमी के कारण फसलों की उत्पादकता लगातार घटती जा रही है, जिससे किसानों की आय पर भी गलत असर पड़ता है। - उत्पादन लागत में वृद्धि का होना:-
मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट होने से अधिक उर्वरकों और संसाधनों की आवश्यकता भी होती है जिससे खेती की लागत महंगी होती जा रही है। - खाद्य सुरक्षा पर बढ़ता संकट:-
भारत की बढ़ती जनसंख्या के लिए खाद्य उत्पादन बनाए रखना भी एक गंभीर चुनौती है और घटती उर्वरकता इस दिशा में एक बड़ा खतरा बनकर सामने आ रहा है। - पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ता गंभीर असर:-
जमीन की खराब गुणवत्ता जल संसाधनों को भी गंभीर रूप से प्रभावित करती है। प्रदूषित मिट्टी से होकर नदियों और भूजल में रसायन तेजी से पहुँचते हैं। जो मिट्टी के लिए नुकसानदायक होता है।
https://www.tractorjunction.com/farming-tips-news/follow-these-tips-to-increase-fertility/
इसके समाधान के मुख्य उपाय:-
- जैविक खेती को ज्यादा-से-ज्यादा प्रोत्साहन देना:-
जैविक खाद जैसे गोबर खाद, वर्मी कम्पोस्ट, हरी खाद, जीवामृत आदि का अधिक-से-अधिक प्रयोग करना मिट्टी की गुणवत्ता को सुधारता है। - समय-समय पर मृदा परीक्षण (Soil Testing):-
प्रत्येक किसान को सरकार द्वारा मृदा परीक्षण की सुविधा दी जानी चाहिए ताकि वह सही से जान सके कि उसकी जमीन में कौन-कौन से पोषक तत्वों की कमी है और उसी के अनुसार उर्वरकों का प्रयोग हो सकता है। - फसल चक्र और मिश्रित खेती का होना:-
फसलों को बदल-बदलकर बोने की विधि से मिट्टी की थकान दूर होती है और उसे पोषण भी प्रदान होता है। साथ ही दलहनी फसलों की खेती मिट्टी में नाइट्रोजन जोड़ने में भी सहायक होती है।
जमीन में वैज्ञानिक और तकनीकी हस्तक्षेप का होना:-
कृषि विश्वविद्यालयों और वैज्ञानिक संस्थानों को मिलकर ऐसी तकनीकों का सही से विकास करना चाहिए जो सस्ती, सरल और प्रभावी ढंग से काम करे। कृषि विस्तार सेवाओं के माध्यम से किसानों को जागरूक करने की भी आवश्यकता है।
इसका निष्कर्ष: एक नजर में
भारत में खेती की जमीन की घटती उर्वरकता एक गंभीर आपदा को जन्म दे रही है। यह केवल कृषि उत्पादन से ही जुड़ी मात्र नहीं है, बल्कि यह देश की आर्थिक समृद्धि, खाद्य सुरक्षा और पारिस्थितिकी संतुलन से भी काफी हद तक जुड़ी हुई है। यदि समय रहते कारगर उपाय सरकार द्वारा नहीं किए गए, तो भविष्य में कृषि संकट और भी गहरा हो सकता है। इसके लिए सरकार, वैज्ञानिक, किसान और समाज सभी को मिलकर ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है ताकि भारत की धरती फिर से उपजाऊ हो सके और जय जवान, जय किसान का नारा भी देश के लिए सार्थक हो सके।