सुप्रीम कोर्ट का निर्णायक फैसला जिसमें अब दहेज केस में सुलह के लिए मिलेगा 2 महीने का समय। क्या है मामला? Always Right or Wrong.
सुप्रीम कोर्ट का चौकने वाला फैसला: दहेज के मामले में सुलह के लिए दिया जाएगा 2 महीने का समय: उससे पहले कोई गिरफ्तारी नहीं
भारत में विवाह एक पवित्र बंधन के रूप में माना जाता है, लेकिन यह बंधन तब जाकर त्रासदी का रूप ले लेता है जब इसमें समाज द्वारा दहेज जैसी कुप्रथा शामिल कर ली जाती है। दहेज प्रताड़ना से जुड़े किसी भी मामलों में लंबे समय से न्यायिक और सामाजिक बहस चलती रहती है। हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है जिसमे कहा गया है कि दहेज उत्पीड़न जो 498A IPC के अंतर्गत आता है, मामलों में पति-पत्नी को सुलह के लिए 2 महीने का समय दिया जाएगा, जिससे वैवाहिक रिश्तों को एक और मौका दिया जा सके। यह फैसला न्याय और सामाजिक संतुलन दोनों के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण होता दिख रहा है।
कानून की धारा 498A क्या है, इसका कानूनी प्रावधान पर संक्षिप्त बिन्दु:-
भारतीय दंड संहिता की धारा 498A उन मामलों से संबंधित मानी जाती है, जहां कोई महिला अपने पति या ससुरालवालों द्वारा क्रूरता या दहेज की मांग के कारण प्रताड़ित हुआ होता है। यह एक गैर-जमानती और संज्ञेय अपराध होता है, जिसमें आरोपी की गिरफ्तारी के साथ-साथ उन्हें सजा भी दी जा सकती है। इसके कुछ मुख्य बिन्दु हैं जिसके अंतर्गत यह धारा वर्ष 1983 में दहेज मृत्यु और प्रताड़ना की बढ़ती घटनाओं के कारण सरकार द्वारा जोड़ी गई थी। इसमें अधिकतम तीन साल तक की सजा और जुर्माना दोनों हो सकते हैं।
आरोपी व्यक्ति को पुलिस द्वारा तुरंत गिरफ्तार भी किया जा सकता है। इस धारा के दुरुपयोग की शिकायतें भी बड़ी संख्या में देखने को मिल रही हैं, जिससे इसके न्यायिक उपयोग पर भी कोर्ट के प्रश्न उठे हैं।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का मुख्य उद्देश्य:-
- पारिवारिक संस्थाओं की रक्षा करना सुप्रीम कोर्ट का मुख्य उद्देश्य है, जिसके अंतर्गत भारत में विवाह और परिवार की संस्था सामाजिक संरचना की नींव मजबूत होगी। कोर्ट का यह मानना है कि यदि वैवाहिक रिश्ता किसी भी तरह से बच सकता है तो उसे एक मौका अवश्य दिया जाना चाहिए।
- झूठे मामलों से राहत पीड़ित पक्ष को राहत मिलेगा। कई बार दहेज प्रताड़ना के झूठे आरोप भी एक पक्ष द्वारा लगाए जाते हैं, जिससे पति पक्ष को मानसिक, सामाजिक और आर्थिक परेशानी का सामना भी करना होता है। कोर्ट का यह भी मानना है कि इस तरह के मामलों को बिना जांच के आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।
- बिना दबाव के सुलह कराना भी कोर्ट का उद्देश्य है, जिसमें पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि सुलह प्रक्रिया के दौरान किसी भी पक्ष पर कोई दबाव नहीं डाला जा सकता और यदि महिला सुलह नहीं चाहती, तो प्रक्रिया स्वतः ही समाप्त हो जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के लाभ पर के नजर:-
- इस फैसले से वैवाहिक जीवन को एक मौका मिलेगा, जिसमें कई बार गुस्से या तनाव के कारण लिए गए फैसले बाद में पछतावे में बदल जाया करते हैं। 2 महीने का समय किसी दंपति को सोचने और सुलह करने का अवसर भी प्रदान करेगा।
- न्यायपालिका पर बोझ भी कम होगा क्योंकि सुलह के मामलों में मुकदमे वापस लेने से अदालतों में लंबित मामलों की संख्या काफी तेजी से घटेगी।
- फैमिली सिस्टम को मजबूती मिलेगी क्योंकि यह फैसला परिवारों को जोड़ने की दिशा में एक प्रगतिशील कदम माना जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट की संभावित चिंताएँ और फैसले की आलोचनाएँ:-
- इस निर्णय से महिला के अधिकारों की अनदेखी होगी क्योंकि कुछ महिला संगठनों ने अपनी चिंता भी व्यक्त की है कि इससे पीड़ित महिलाओं पर सुलह का दबाव भी ज्यादा बढ़ सकता है।
- महिला पर समाजिक दबाव का डर भी बढ़ेगा। भारतीय समाज में कई बार महिलाएं सामाजिक दबाव में आकर सुलह करने को मजबूर तो हो जाती हैं लेकिन वह जीवन भर समझौता ही करती रहती हैं।
- दहेज के मामलों में देरी से निपटान होगा क्योंकि अगर हर केस में 2 महीने का वेटिंग पीरियड जोड़ा जाने लगेगा, तो मुकदमों के निपटारे में देरी होती जाएगी।
इसका निष्कर्ष: संक्षिप्त वर्णन
सुप्रीम कोर्ट द्वारा लिया गया यह फैसला भारत की न्याय प्रणाली में एक संतुलित सोच का प्रतीक भी साबित हो सकता है, जहां न तो महिलाओं के अधिकारों की अनदेखी की जाएगी और न ही दहेज के झूठे मामलों में फंसने वालों को ही नजरअंदाज किया जा सकेगा। भारतीय न्याय संहिता की धारा 498A जैसे मामलों में सुलह के लिए दिया गया 2 महीने का समय, समाज और कानून दोनों के बीच पुल बनाने की एक अच्छी कोशिश होगी। कोर्ट का यह कदम तभी सफल हो सकता है जब इसे संवेदनशीलता, निष्पक्षता और स्वतंत्र इच्छा के साथ सरकार द्वारा पालन कराया जाये।