क्या है नक्सली (Naxalism) समस्या का समाधान? भारत में कितनी बची हैं नक्सलवाद (Naxalism) की जड़ें, 1 साल में इसके खात्मे के लक्ष्य में क्या हैं चुनौतियां?

नक्सलवाद क्या है ? इसकी समस्याओं पर आधारित कुछ बिन्दु:-
- नक्सलवादी विचारधारा’ एक आंदोलन से जुड़ी हुई विचारधारा है। बात 1960 के दशक की है जब कम्युनिस्ट यानी साम्यवादी विचारों से समर्थित लोगों ने इस आंदोलन को आरंभ किया था।
- इस आंदोलन की शुरुआत पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग ज़िले के नक्सलबाड़ी गाँव से हुई मानी जाती है, इसी कारण यह नक्सलवादी आंदोलन के रूप में जाना जाने लगा।
- नक्सलवाद से जुड़े लोगों को नक्सली कहा जाता है। इस आंदोलन में शामिल लोगों को कुछ विद्वान माओवादी भी कहते हैं।
- इस आंदोलन की शुरूआत हिंसा से हुई और इसमें सत्ता की मदद करने वालों और धनवानों को मार डालना एक आम बात है। वास्तव में कहा जाए तो यह आंदोलन अन्याय और गैर बराबरी से पैदा हुआ था जो आज के समय में देश और समाज के लिये एक नासूर सा बन गया है। लेकिन दुखद हो यह है कि हमारी सरकारें और सामाजिक सिस्टम अभी तक इसकी काट नहीं ढूंढ सका है।
- भूमि सुधार की पहल आजादी के बाद शुरू हुई थी। लेकिन यह पूरी तरह कामयाब नहीं रही। जमींदारों का अत्याचार नक्सलबाड़ी किसानों पर बढ़ता गया और इसी के मद्देनजर जमींदारों और किसान के बीच ज़मीन विवाद पैदा होता चला गया। आखिरकार 1967 में कम्युनिस्टों विचारधारा के एक समूह ने सत्ता के खिलाफ एक सशस्त्र आंदोलन की शुरुआत की थी जो वर्तमान समय तक जारी है और सरकार के लिए सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है।
- नक्सलवाद से जुड़े आंदोलन के समर्थक बेरोज़गारी, भुखमरी और गरीबी से आजादी की मांग करते रहे हैं।
- नक्सलवादी और माओवादी दोनों प्रकार के आंदोलन हिंसा पर आधारित हैं। दोनों में दोनों में अंतर सिर्फ इतना है कि नक्सलवाद बंगाल के नक्सलबाड़ी में विकास के अभाव और गरीबी के सताये लोगों का नतीजा है जबकि चीनी नेता माओत्से तुंग की राजनीतिक विचारधारा और उनके कार्यों से प्रभावित विचारधारा को माओवाद का नाम दिया गया।
- किसानों पर हो रहे जमींदारों द्वारा अत्याचार और उनके अधिकारों को छीनना एक पुरानी प्रथा सी रही है और देश भर में इसके लाखों साक्ष्य मौजूद हैं। जबकि नक्सलबाड़ी के किसान भी इसी समस्या का सामना कर रहे थे।
- चारु मजूमदार भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता ने कानू सान्याल और जंगल संथाल के साथ मिलकर सत्ता के खिलाफ एक विद्रोह किया था। 60 के दशक के आखिर के समय में और 70 के दशक के शुरुआती समय में, नक्सलबाड़ी विद्रोह ने शहरी और ग्रामीण लोगों दोनों को सरकार के खिलाफ भड़का लिया था।
- इसी प्रकार का आंदोलन बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में भी फैल गया और आगे चलकर यह ओडिशा, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र में भी फैल गया।
- आजादी के बाद पहली बार किसी आंदोलन ने गरीब और भूमिहीन किसानों की मांगों को मजबूती प्रदान की जिसने तत्कालीन भारतीय राजनीति की तस्वीर ही बदल दी।
नक्सली हिंसा में कितनी कमी आई है?
- साल 2008 में 223 ज़िले नक्सल से बुरी तरह प्रभावित थे लेकिन यूपीए सरकार के प्रयासों से इनमें कमी आई और 2014 में यह संख्या घटकर 161 रह गई। साल 2017 में नक्सल प्रभावित ज़िलों की संख्या और घटकर सिर्फ 126 रह गई।
- साल 2024 में आई एक रिपोर्ट द्वारा गृह मंत्रालय ने आकड़ें जारी किए जिसके मुताबिक 8 नए ज़िले ऐसे शामिल हुए जहाँ पहली बार नक्सली गतिविधियाँ देखी गई हैं। केरल में ऐसे तीन, ओडिशा में दो और छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश तथा आंध्र प्रदेश में एक-एक ज़िले ऐसे हैं जहां इस प्रकार की घटनाएँ पायी गईं हैं।
- सरकार के सामने बहुत सी चुनौतियों के बावजूद नक्सली घटनाओं में बहुत हद तक कमी आई हैं।
- बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा को सबसे ज्यादा नक्सल प्रभावित राज्यों की सूची में रखा गया है।
- गृह मंत्रालय की कुछ समय पहले आई एक रिपोर्ट से पता चलता है कि 44 जिले ऐसे हैं जिन्हे नक्सल मुक्त घोषित कर दिया गया है जबकि 8 नए ज़िलों में नक्सली घटनाएँ देखी जा रही हैं। नक्सल प्रभावित ज़िलों की कुल संख्या अब 90 रह गयी है। ये सभी ज़िले देश के 11 राज्यों में हैं जिनमें से तीस सबसे ज्यादा नक्सल घटनाओं वाले राज्य बताए गए हैं।
- पिछले एक दशक में नक्सली घटनाओं में कमी आई है और कई ज़िलों को नक्सल गतिविधियों से मुक्त घोषित कर दिया गया है। लेकिन कई नए ज़िले ऐसे भी हैं जिनमें नक्सली गतिविधियाँ शुरू हुई हैं, इतिहास में इन जिलों में ऐसी कोई गतिविधियां नहीं थी।
देश में नक्सलवाद की समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाए जाने की आवश्यकता होगा, जिसमें सुरक्षा, विकास, राजनीतिक समावेशन और संवाद आदि शामिल हों। आइये कुछ मुख्य प्रभावी बिन्दुओं पर प्रकाश डालते हैं:-
- सुरक्षा और सैन्य कार्रवाई द्वारा-
- नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में ज्यादा से ज्यादा सुरक्षा बलों की तैनाती की जानी चाहिए। ताकि छोटी छोटी घटनाओं को भी तुरंत रोका जा सके।
- नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में खुफिया तंत्र को मजबूत किया जाना चाहिए जिससे उनकी छोटी से छोटी प्रतिकृया पर भी नजर रखी जा सके।
- ऐसे प्रभावित क्षेत्रों में स्थानीय पुलिस पद्धति को सशक्त बनाया जाना चाहिए।
- आधुनिक तकनीक और ड्रोन सर्विलांस का उपयोग किया जाना चाहिए।
2. विकास और बुनियादी सुविधाएं अपनाई जानी चाहिए-
- सड़क, बिजली, पानी और संचार सुविधाओं का विस्तार किया जाना चाहिए, ताकि कोई भी नागरिक बुनियादी सुविधाओं से वंचित रहकर भटक न जाये।
- शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को सुधारना जाना चाहिए जिससे प्रत्येक नागरिक अपना अच्छा बुरा सोच सके।
- रोजगार के अवसर बढ़ाए जाने चाहिए ताकि युवाओं को नक्सलवाद की ओर जाने से रोका जा सके और उन्हे आगे बढ्ने के अच्छे अवसर प्रदान किए जा सकें।
3. राजनीतिक समाधान और संवाद होना चाहिए-
- नक्सली संगठनों से बातचीत के प्रयास किए जाने चाहिए जिससे उन्हे ये समझाया जा सके कि वे भी हमारे ही लोग हैं वे अपने आपको हमसे अलग न समझें।
- आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों का पुनर्वास की व्यवस्था की जानी चाहिए ताकि उन्हे अभाव में कोई फिर से गलत राह पर न ले जाये।
- स्थानीय समुदायों को राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल किया जाना चाहिए क्योंकि स्थानीय लोग अपने नेता की बात जल्दी स्वीकार करते हैं।