तिब्बत में ब्रह्मपुत्र नदी पर चीन बना रहा दुनिया का सबसे बड़ा बांध, इससे भारत के लिए क्या मुसीबत? जाने विस्तार से। 2025, Always Right or Wrong.
चीन द्वारा ब्रह्मपुत्र नदी पर हो रहा बांध का निर्माण:-
तिब्बत में ब्रह्मपुत्र नदी को यारलुंग त्सांगपो कहा जाता है। ब्रह्मपुत्र नदी दक्षिण एशिया की प्रमुख नदियों में से एक मानी जाती है। यह तिब्बत क्षेत्र से निकलकर भारत के अरुणाचल प्रदेश और असम होते हुए बांग्लादेश में प्रवेश करती है। चीन द्वारा तिब्बत में इस नदी पर एक बहुत बड़े बांध निर्माण की शुरुआत की जा रही है। इस खबर ने भारत और बांग्लादेश में चिंता की लहर पैदा कर दी है। बांध निर्माण की यह परियोजना न केवल पर्यावरण और स्थानीय पारिस्थितिकी के लिए खतरा समझी जा रही है, बल्कि इससे क्षेत्रीय सामरिक संतुलन और भू-राजनीति को भी प्रभावित किया जा रहा है।
भारत के लिए ब्रह्मपुत्र नदी का कितना महत्व:-
- जल स्रोत के क्षेत्र में: ब्रह्मपुत्र नदी को भारत के सभी पूर्वोत्तर राज्यों के लिए जीवन रेखा के तौर पर माना जाता है। यह कृषि, पीने के पानी, मत्स्य पालन, परिवहन और हाइड्रोपावर के लिए भी काफी महत्वपूर्ण नदी है।
- पूर्वोत्तर में बाढ़ नियंत्रण: यह नदी मानसून के दौरान अत्यधिक जल लेकर भारत में प्रवेश करती है और इसका प्रवाह असम व बांग्लादेश में बाढ़ का भी गंभीर कारण बनता है। किसी भी प्रकार की कृत्रिम अवरोध या जल की रोकटोक इस क्षेत्र में बाढ़ या सूखे के खतरे को बढ़ा सकती है।
- इसका राजनयिक संदर्भ: ब्रह्मपुत्र नदी एक अंतरराष्ट्रीय नदी है जो तीन देशों; जिनमें चीन, भारत और बांग्लादेश से होकर गुजरती है। ऐसे में इस पर किसी एक देश का एकतरफा निर्माण कार्य अंतरराष्ट्रीय जल संधियों और पड़ोसी देशों के हितों को बहुत अधिक प्रभावित कर सकता है।
चीन के बांध निर्माण की परियोजना की मुख्य विशेषताएँ:-
चीन द्वारा यह बांध तिब्बत के मेडोग काउंटी नमक क्षेत्र में बनाया जा रहा है, जो भारत के अरुणाचल प्रदेश से काफी निकट है। यह वही क्षेत्र है जिसे भारत अपना हिस्सा मानता है, जबकि चीन उसे दक्षिण तिब्बत के नाम से पुकारता है। चीन की यह परियोजना एक सुपर हाइड्रोपावर डैम के रूप में प्रस्तावित की गयी है, जिसकी क्षमता चीन की प्रसिद्ध थ्री गॉर्जेस डैम से भी बहुत अधिक बताई जा रही है। इस परियोजना के माध्यम से बिजली उत्पादन, जल भंडारण, बाढ़ नियंत्रण और क्षेत्रीय विकास इसके प्रमुख उद्देश्यों में से एक है।
चीन के बांध बनाने से भारत की क्या चिंता:-
- जल प्रवाह में कमी होगी: यदि चीन ऊपरी हिस्से में आने वाले जल को रोकता है तो भारत के निचले हिस्सों में विशेषकर असम और अरुणाचल प्रदेश में जल की उपलब्धता में भारी कमी देखने को मिलेगी। जिससे कृषि, जल आपूर्ति और जैव विविधता पर काफी नकारात्मक असर देखने को मिलेगा।
- बाढ़ का बढ़ता खतरा: मानसून के समय चीन यदि अचानक जल छोड़ देता है तो इससे असम और बांग्लादेश में अचानक बाढ़ की स्थिति पैदा हो सकती है। पूर्व में ऐसी बहुत सी घटनाएँ हो चुकी हैं।
- इसमें सूचना की पारदर्शिता नहीं होगी: चीन ट्रांसबाउंड्री जल प्रवाह पर डेटा साझा नहीं करता या उसमें पारदर्शिता कभी नहीं दिखाता है, जिससे भारत को नदी की स्थिति का सही अंदाज़ा कभी नहीं मिल पाता है।
- इस मुद्दे का सामरिक दृष्टिकोण पर एक नजर: तिब्बत में किसी भी होने वाले बड़े निर्माण को भारत सामरिक दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण मानता है। यह क्षेत्र भारत-चीन सीमा विवाद का प्रमुख केंद्र भी बना हुआ है। चीन द्वारा भारत के लिए जल को एक रणनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता है।
चीन के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून और संधियाँ:-
- वर्ष 1997 में हुई यूएन वाटरकोर्स कन्वेंशन: वर्ष 1997 में हुई यह संधि ट्रांसबाउंड्री जलमार्गों के न्यायपूर्ण और समन्वित उपयोग की वकालत भी गंभीर रूप से करती है। हालांकि, चीन इस संधि पर हस्ताक्षरकर्ता देश नहीं है।
- इसमें परामर्श की आवश्यकता भी होगी: कई अंतरराष्ट्रीय प्रोटोकॉल में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि ट्रांसबाउंड्री जलमार्ग पर किसी भी निर्माण से पहले किसी भी देश को संबंधित देशों से परामर्श लेना और जानकारी साझा करना बेहद आवश्यक है।
- भारत-चीन में हुए समझौते: वर्ष 2002 और वर्ष 2013 में भारत-चीन के बीच हुए ब्रह्मपुत्र जल प्रवाह पर डेटा साझा करने को लेकर काफी महत्वपूर्ण समझौते हुए थे। हालांकि, भारत-चीन में हुए डोकलाम विवाद के बाद चीन ने स्वयं ही कई बार सूचनाएं रोक दीं थीं।
इसका निष्कर्ष:-
चीन द्वारा ब्रह्मपुत्र नदी पर बांध निर्माण केवल एक बुनियादी ढांचा परियोजना मात्र नहीं है, बल्कि यह एक बहुआयामी भू-राजनीतिक घटनाक्रम को भी दर्शाती है, जिसमें सामरिक, पर्यावरणीय, सामाजिक और आर्थिक सभी प्रकार के पहलू सम्मिलित हैं। भारत और बांग्लादेश जैसे निचले देशों के लिए यह जल सुरक्षा का मामला भी बनता है, जबकि चीन इसे अपनी ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय प्रभुत्व से जोड़कर भी देख रहा है।