भारतीय न्यायपालिका में लंबित मामलों का मुद्दा, लंबित मामलों का बढ़ता दबाव, 2025 में क्या हैं सुधार ? जाने विस्तार से।
भारतीय न्यायपालिका में लंबित मामलों पर एक नजर:-
भारतीय न्यायपालिका में लंबित मामलों की संख्या साल दर साल तेजी से बढ़ रही है, जिससे भारतीय न्यायपालिका पर भी भारी दबाव पड़ता जा रहा है। यह समस्या न केवल आम नागरिकों के लिए न्याय प्राप्ति करने के मार्ग को कठिन बनाती है, बल्कि भारतीय न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़ा करती है। आइये इस समस्या पर विस्तार से चर्चा करें।
भारतीय न्यायपालिका
भारतीय न्यायपालिका में लंबित मामलों की वर्तमान में स्थिति पर एक नजर:-
राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (NJDG) के एक सर्वे के अनुसार, 2025 की शुरुआत तक भारत में करीब तीन करोड़ से अधिक केस विभिन्न अदालतों में लंबित हैं और साथ ही:
- लगभग 4 करोड़ मामले जिला एवं अधीनस्थ न्यायालयों में कई वर्षो से लंबित हैं।
- लगभग 60 लाख के आसपास मामले उच्च न्यायालयों में लंबित चल रहे हैं।
- लगभग 85 हजार से अधिक मामले सुप्रीम कोर्ट में वर्षों से लंबित हैं।
यह संख्या साल दर साल कम होने के बजाए बढ़ती ही जा रही है, जो इस बात का प्रमाण है कि न्याय देने की प्रक्रिया अत्यंत धीमी हो गई है।
न्यायालयों में लंबित मामलों के प्रमुख कारण:-
- न्यायाधीशों की भारी कमी: भारत में प्रति दस लाख जनसंख्या पर 15 न्यायाधीशों की संख्या अन्य विकसित देशों की तुलना में बहुत ही कम है। न्यायाधीशों के खाली पद लंबे समय तक नहीं भरने से न्यायिक प्रक्रिया बाधित और धीमी हो जाती है।
- प्रक्रियागत बढ़ती जटिलताएँ: भारतीय न्याय प्रणाली में प्रक्रियाएँ अत्यधिक जटिल और समय लेने वाली प्रतीत होती हैं। मामलों की सुनवाई में कई बार अनावश्यक रूप से स्थगित किया जाता है, जिससे लंबित मामले वर्षों तक चलते रहते हैं।
- देश में अपराधों और दीवानी मामलों की बढ़ती संख्या: भारत में जनसंख्या वृद्धि और सामाजिक-आर्थिक तनावों के कारण आपराधिक एवं दीवानी मामलों की संख्या में लगातार वृद्धि देखने को मिल रही है।
- देश में तकनीकी अवसंरचना की कमी: देखा जाये तो निचली अदालतों में अभी भी डिजिटल तकनीकों का पूर्ण इस्तेमाल नहीं हो पाया है, जिससे काम की गति धीमी रहती है और समय भी बर्बाद होता है।
- देश में सरकारी मामलों की अधिकता: अदालतों में लंबित कुल मामलों का एक बड़ा हिस्सा केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा दायर की गयी याचिकाओं का होता है।
- समाज में बढ़ती कानूनी जागरूकता: जैसे-जैसे लोग अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो रहे हैं, मुकदमों की संख्या में भी तेजी से वृद्धि हो रही है। हालांकि यह सकारात्मक है, परंतु इससे अदालतों पर लगातार बोझ भी बढ़ता जा रहा है।
प्रभाव
- न्याय में देरी होना न्याय से इनकार के बराबर: “Justice delayed is justice denied” की कहावत बिलकुल सही है। वर्षों तक मामला लंबित रहने से पीड़ितों के साथ अन्याय ही है।
- न्याय के प्रति जनता का विश्वास घटता जाता है: जब देश के नागरिकों को लगता है कि उन्हें न्यायालय द्वारा समय पर न्याय नहीं मिलेगा, तो वे दूसरे रास्तों जैसे कि भ्रष्टाचार या निजी प्रतिशोध का रास्ता अपनाने लगते हैं।
- देश के आर्थिक विकास में बाधा: व्यावसायिक मामलों की देरी से निवेशकों का भरोसा घटता जाता है, जिससे भारत की Ease of Doing Business रैंकिंग पर भी बुरा असर पड़ता है।
- कारागारों में बढ़ती भीड़: कई विचाराधीन कैदी वर्षों तक जेल में बंद पड़े रहते हैं क्योंकि उनके मुकदमों की सुनवाई समय पर नहीं होती है।
https://youtu.be/zaCgXdEinrk
न्याय का संभावित समाधान:-
- न्यायालयों में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना: भारत को अपने न्यायिक प्रणाली में न्यायाधीशों की संख्या में तेजी से वृद्धि करनी चाहिए। नियुक्तियों की प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए उन्हे त्वरित एवं पारदर्शी बनाना चाहिए।
- देश में फास्ट ट्रैक कोर्ट्स की स्थापना: विशेष प्रकार के मामलों के लिए (जैसे बलात्कार, भ्रष्टाचार, व्यावसायिक विवाद) देश में फास्ट ट्रैक कोर्ट्स बनाए जाएँ ताकि त्वरित न्याय दिया जा सके।
- न्यायालयों में तकनीकी सुधार: e-Courts परियोजना जैसे प्रयासों को विस्तार देना होगा। ऑनलाइन दाखिला, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सुनवाई और दस्तावेज़ों का डिजिटलीकरण समय की बचत और तेजी से न्याय में सहायक होगा।
- देश में वैकल्पिक विवाद निवारण को बढ़ावा देना:- मध्यस्थता, सुलह और पंचायती प्रणाली जैसे वैकल्पिक उपायों को अपनाकर अदालतों पर बोझ कम किया जाना चाहिए।
- न्यायालयों से पहले सरकारी मामलों की पुनः समीक्षा: सरकार को आपसी विवाद की स्वयं समीक्षा करनी चाहिए जब आवश्यक हो तभी न्यायालय जाएँ और अनावश्यक मुकदमों को वापस लेना चाहिए ताकि न्यायालयों का समय बर्बाद न हो।
- देश में कानूनी शिक्षा और जनजागरूकता अभियान: जनता को उनके कानूनी अधिकारों एवं विवाद निपटान के वैकल्पिक तरीकों के बारे में जागरूक करना चाहिए ताकि न्यायिक बोझ को कम किया जा सके।
- देश में मामलों की प्राथमिकता निर्धारण: अदालतों को मामलों की गंभीरता, सार्वजनिक हित और पीड़ित की स्थिति को ध्यान में रखते हुए प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
इसका निष्कर्ष क्या है ? :-
देश में न्याय को लेकर बहुत से सुधारों की आवश्यकता है। भारत की न्यायपालिका बहुत ही महत्वपूर्ण पिलर है जो लोकतंत्र को मजबूत बनाती है। लेकिन बढ़ते लंबित मामलों ने इसकी प्रभावशीलता को कम किया है। आम तौर पर समाज के मन में यह धारणा बनी हुई है कि अगर न्याय के लिए न्यायालय गए तो कई वर्षों का इंतजार करना ही पड़ेगा। यदि समय रहते इस समस्या को दूर करने के लिए ठोस और टिकाऊ कदम नहीं उठाए जाते हैं, तो न्याय प्रणाली का जो उद्देश्य है; समय पर न्याय एक कल्पना मात्र ही रह जाएगा।
साथ ही सरकार, न्यायपालिका और समाज को मिलकर न्यायिक सुधारों की ओर मजबूती से कार्य करने की आवश्यकता है जिससे देश के प्रत्येक नागरिक को आसान, सस्ता और जल्दी न्याय मिल सके। ताकि वह अपनी ताकत का इस्तेमाल सही जगह कर सके।