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2025: सुप्रीम कोर्ट ने दिया आदेश, साकेत से लाजपत नगर और इंद्रलोक से इंद्रप्रस्थ तक दिल्ली मेट्रो लाइन पर आ रहे पेड़ों को काटने की इजाजत दी।

2025: दिल्ली मेट्रो के रास्ते में आने वाले पेड़ों को कटाई की सुप्रीम कोर्ट ने शर्तों के साथ दी अनुमति:-

सुप्रीम कोर्ट:- दिल्ली भारत देश की राजधानी है जो आज न केवल जनसंख्या विस्फोट और प्रदूषण के संकट से बुरी तरह प्रभावित है बल्कि बुनियादी ढांचे का विकास और पर्यावरण संरक्षण को संतुलित बनाए रखने की चुनौती से भी सामना कर रही है। हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश दिया है जिसमे दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (DMRC) को पेड़ों की कटाई की अनुमति शर्तों के साथ मिल गयी है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न केवल एक महत्वपूर्ण कानूनी निर्णय है, बल्कि यह पर्यावरणीय समस्याओं और शहरी विकास योजनाओं के बीच संतुलन साधने का प्रयास भी है।

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दिल्ली मेट्रो की पृष्ठभूमि:-

देखा जाये तो दिल्ली मेट्रो का नेटवर्क लगातार विस्तार कर रहा है ताकि बढ़ती आबादी को ध्यान में रखते हुए यातायात आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके। दिल्ली में मेट्रो फेज़ 4 का निर्माण कार्य विभिन्न तकनीकी और कानूनी अड़चनों के कारण रुका हुआ था, जिनमें सबसे बड़ी समस्या थी पेड़ों की कटाई करना जो मेट्रो मार्ग में आ रहे थे। मेट्रो के प्रस्तावित मार्ग में कई ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ बड़ी संख्या में वृक्ष हैं और इन वृक्षों को हटाए या काटे बिना मेट्रो का निर्माण करना संभव नहीं था।

मेट्रो के निर्माण के खिलाफ पर्यावरण कार्यकर्ताओं और गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) ने अपनी आवाज उठाई और बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर संतुलित विचार अपनाते हुए जरूरी शर्तों के साथ पेड़ों की कटाई की अनुमति दे दी और जिन पेड़ों को बचाया जा सकता है उन्हे दूसरी जगह स्थानांतरित करने की अनुमति दी।

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दिल्ली मेट्रो के केस में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय रहा विशेष:-

मेट्रो के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिल्ली मेट्रो एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक उपक्रम है इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता  जिस निर्णय से लाखों लोगों को फायदा होगा, लेकिन साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पर्यावरण की कीमत पर कोई विकास नहीं होना चाहिए। इसलिए, सुप्रीम कोर्ट ने कुछ सख्त शर्तों के साथ डीएमआरसी को पेड़ काटने की अनुमति प्रदान की:-

  1. पुनः पेड़ रोपण की शर्त पर: डीएमआरसी को प्रत्येक कटे हुए पेड़ के बदले में कम से कम 15 नए पेड़ लगाने होंगे।
  2. सही स्थान का चयन: नए पेड़ों का रोपण केवल कागजों तक सीमित न रहे। उसे वास्तविक स्थानों पर भी लगाया जाए, जहां उनकी देखभाल सही से हो सके।
  3. मेट्रो द्वारा पेड़ों की देखभाल: मेट्रो द्वारा लगाए गए पौधों की कम से कम 8 साल तक देखभाल व निगरानी करनी आवश्यक होगी।
  4. मेट्रो के वैकल्पिक मार्गों पर विचार: कोर्ट ने मेट्रो को यह भी सुझाव दिया कि जहां संभव हो, मेट्रो द्वारा ऐसे मार्ग चुने जाएं जिनमें पेड़ों को कम से कम काटा जाये।
  5. सुप्रीम कोर्ट ने स्वतंत्र निगरानी निकाय नियुक्त करने को कहा: सुप्रीम कोर्ट के अनुसार एक स्वतंत्र एजेंसी नियुक्त की जाये जिसमे यह  सुनिश्चित किया जाये कि कटाई और पुनः रोपण की प्रक्रिया स्वतंत्र एवं पारदर्शी हो।
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पेड़ कटाई से होने वाली पर्यावरणीय चिंताएं:-

भारत में दिल्ली एक ऐसा शहर है जहां प्रदूषण हर साल हजारों लाखों लोगों की जान लेता है साथ ही वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) अधिकांश समय खतरनाक श्रेणी में पहुँच जाता है। कोर्ट ने कहा कि पेड़ न केवल वायु को शुद्ध करते हैं, बल्कि धूल, शोर और तापमान को भी नियंत्रित करने में हमारी मदद करते हैं।

इन सब को देखते हुए पेड़ों की कटाई एक चिंता का विषय है क्योंकि इससे शहरी पारिस्थितिकी तंत्र लगातार प्रभावित हो रहा है। साथ ही जब बड़े, पुराने पेड़ों को काटा जाता हैं, तो उनके स्थान पर लगाए गए पौधों को ऐसी पारिस्थितिकी का लाभ देने में वर्षों का समय लग जाता है।

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दिल्ली में मेट्रो जैसे प्रोजेक्ट का महत्त्व कितना:-

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हमें यह भी समझना होगा कि मेट्रो जैसी परियोजनाएं पर्यावरण के अनुकूल ही सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देती हैं। एक मेट्रो ट्रेन दिन भर में हज़ारों निजी वाहनों को सड़कों से हटाने में मदद मिलती हैं, जिससे कार्बन उत्सर्जन में कमी आती है।

सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, दीर्घकालिक दृष्टिकोण से देखें, तो शहर में मेट्रो जैसी परियोजनाएं पर्यावरण को अनुकूल बनाने में सहायता प्रदान करती हैं, बशर्ते इनका अनुपालन संवेदनशीलता और सतर्कता के साथ किया जाए।

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इसके समाधान में संतुलन की आवश्यकता:-

देश का विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना आज के समय में सबसे बड़ी आवश्यकता है। न्यायालय का निर्णय इसी संतुलन को बनाए रखने का प्रयास है। यह स्पष्ट संदेश देता है कि विकास को रोका नहीं जाएगा, यदि पर्यावरण के अनुकूल और जिम्मेदारी के साथ होगा।

पर्यावरण को अनुकूल बनाए रखने के लिए कुछ और कदम भी उठाए जा सकते हैं जैसे:-

  1. ऊर्ध्वाधर मेट्रो मार्ग का निर्माण: जहां तक संभव हो सके, ऊंचाई या भूमिगत मार्गों का चयन ठीक प्रकार से किया जाए ताकि जमीन पर पेड़ों की कटाई कम हो सके।
  2. सरकार द्वारा पर्यावरणीय मूल्यांकन: परियोजना से पहले क्षेत्र का पर्यावरणीय मूल्यांकन किया जाना चाहिए और उसी के अनुसार कार्ययोजना बनाई जानी चाहिए ताकि सब ठीक प्रकार से किया जा सके।
  3. सरकार द्वारा जन सहभागिता: जहां भी निर्माण हो वहाँ स्थानीय निवासियों और पर्यावरणविदों को निर्णय प्रक्रिया में शामिल किया जाना चाहिए ताकि सामाजिक स्वीकार्यता को बढ़ाया जा सके।
  4. हरित पट्टी का निर्माण: शहर में मेट्रो मार्गों के साथ-साथ पेड़ों की बेल्ट को भी तैयार किया जाना चाहिए, जिससे पारिस्थितिकी संतुलन को बनाया जा सके।
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इस मामले का निष्कर्ष:-

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिल्ली मेट्रो के लिए पेड़ों की कटाई की सशर्त अनुमति देना एक संवेदनशील और व्यावहारिक निर्णय कहा जाएगा। यह आदेश न केवल एक बहुत बड़ा बुनियादी ढांचा परियोजना को आगे बढ़ने का रास्ता दिखाई देता है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के नियमों की अनदेखी भी नहीं करता है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा यह निर्णय हमें यह सिखाता है कि विकास और पर्यावरण कभी कभी एक-दूसरे के विरोधी नहीं होते, बहुत बार दोनों को संतुलित रूप से आगे भी बढ़ाया जा सकता है।

साथ ही हमें यह भी समझने की ज़रूरत है कि पेड़ काटना एक बहुत बड़ी मजबूरी हो सकती है, लेकिन उनका प्रतिस्थापन, देखभाल और संरक्षण हमारी ही जिम्मेदारी है। यदि समाज द्वारा न्यायालय की शर्तों का ईमानदारी से पालन किया जाये और पारदर्शिता के साथ काम किया जाये, तो दिल्ली न केवल एक आधुनिक मेट्रो नेटवर्क वाला शहर भी बन सकता है, बल्कि एक हरा-भरा, स्वच्छ और टिकाऊ जहां कोई नागरिक प्रदूषण के कारण न मरे ऐसा शहर भी बना सकते हैं।

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https://www.aajtak.in/india/news/story/delhi-metro-will-be-cut-trees-coming-way-supreme-court-gives-conditional-permission-ntc-rpti-2228282-2025-04-29

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