चंदा कोचर पर जारी रहे केस

चंदा कोचर मामला: लोन के बदले में 64 करोड़ की रिश्वत लेने के आरोप में चंदा कोचर को दोषी करार दिया गया, ईडी की कार्रवाई भी कोचर पर रहेगी जारी। जाने विस्तार से। Always Right or Wrong.

ट्रिब्यूनल ने माना कि चंदा कोचर और उनके पति दीपक कोचर के खिलाफ चलेगा मनी लांड्रिङ्ग का मामला:- 

चंदा कोचर नाम तो सुना ही होगा, जो कभी भारतीय कॉरपोरेट जगत की सबसे सशक्त महिलाओं में से एक थीं, आज एक कानूनी जाल में बुरी तरह से उलझ चुकी हैं। ट्रिब्यूनल द्वारा यह मान लिया गया है कि उनके और उनके पति दीपक कोचर के खिलाफ यह केस तो बंता है, न केवल उनके करियर बल्कि देश के बैंकिंग सिस्टम में पारदर्शिता और जवाबदेही पर भी गंभीर सवाल उठाने लाजिमी हैं।

चंदा कोचर पर जारी रहे केस

सफलता की मिसाल थी चंदा कोचर:-

चंदा कोचर का जन्म 17 नवंबर 1961 को राजस्थान के जोधपुर में एक माध्यम वर्गीय परिवार में हुआ था। उन्होंने जय हिंद कॉलेज, मुंबई से अपनी पढ़ाई पूरी की और फिर जमनालाल बजाज इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज से मैनेजमेंट की डिग्री भी प्राप्त की। वर्ष 1984 में उन्होंने ICICI बैंक के प्रबंधन प्रशिक्षु के रूप में अपना करियर चुना और धीरे-धीरे मेहनत, बुद्धिमत्ता और निर्णय क्षमता के बल पर शीर्ष पद तक पहुंचीं।

साल 2009 में उन्हें ICICI बैंक की CEO और प्रबंध निदेशक के पद पर नियुक्त हुईं। वे उस दौर में देश की सबसे प्रभावशाली महिलाओं में से एक थीं। “फोर्ब्स”, “टाइम”, और “फॉर्च्यून” जैसी वैश्विक पत्रिकाओं ने उन्हें बार-बार सबसे ताकतवर महिलाओं की सूची में जोड़ा।

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चंदा कोचर पर दीपक कोचर और वीडियोकॉन से जुड़ा विवाद:- 

इस पूरे विवाद की शुरुआत ICICI बैंक द्वारा साल 2009 से साल 2011 के बीच वीडियोकॉन ग्रुप को दिए गए लोन से जुड़ी हुई है। आरोप यह भी है कि चंदा कोचर ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए अपने पति दीपक कोचर को लाभ देने के उद्देश्य से वीडियोकॉन ग्रुप को 1875 करोड़ रुपये का लोन मंजूर करा दिया था, जिसमें हितों का टकराव यानि Conflict of Interest था। चंदा कोचर पर आरोप यह भी है कि ICICI बैंक द्वारा ऋण मिलने के कुछ समय बाद ही वीडियोकॉन ग्रुप ने दीपक कोचर की कंपनी में काफी भारी-भरकम निवेश किया था। यह निवेश इस तरह से किया गया था कि वह स्पष्ट रूप से न दिखे, लेकिन बाद में जांच में यह कड़ी जुड़ती चली गयी।

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मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप में जांच एजेंसियों की विशेष भूमिका:- 

इस मामले की जांच प्रवर्तन निदेशालय (ED) और केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने बड़ी कुशलता से की। आरोप है कि वीडियोकॉन से जुड़े इस लेन-देन में कई फर्जी कंपनियों और जटिल ट्रांजैक्शनों के जरिए पैसे को इधर से उधर किया गया था, जिससे इसे “मनी लॉन्ड्रिंग” की श्रेणी में रखा जाना तय किया गया।

ED ने यह भी दावा किया कि नूपावर रिन्युएबल्स में विदेशी निवेश और बाद के धन प्रवाह में कई संदिग्ध लेनदेन की बड़ी गड़बड़ी भी पायी गयी। आरोप यह भी है कि यह पैसा आखिरकार दीपक कोचर की कंपनी के जरिए निजी लाभ के लिए उपयोग भी हुआ।

https://navbharattimes.indiatimes.com/business/business-news/tribunal-said-icici-bank-ex-ceo-chanda-kochhar-got-rs-64-crore-bribe-to-ok-videocon-loan/articleshow/122809219.cms

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सीईओ को गिरफ्तारी और जमानत का शीलशिला:- 

दिसंबर 2022 में CBI ने चंदा कोचर और दीपक कोचर को गिरफ्तार कर लिया था। हालांकि, बाद में उन्हें कोर्ट से राहत भी मिल गई थी और उन्हें जमानत भी मिली। लेकिन मामला बंद नहीं हो पाया। उनकी गिरफ्तारी से यह भी स्पष्ट हो गया था कि जांच एजेंसियां इसे एक गंभीर वित्तीय अपराध के रूप में मानकर चल रही हैं।

ICICI बैंक की कार्रवाई पर एक नजर:- 

साल 2018 में जब ये आरोप सामने आए तो ICICI बैंक ने पहले चंदा कोचर का खुलकर समर्थन किया। लेकिन जब CBI और ED की जांच में गंभीर अनियमितताएं सामने आने लगीं, तो बैंक ने उन्हें छुट्टी पर भेज दिया और बाद में उन्होंने इस्तीफा भी दे दिया। इसके बाद बैंक ने उनकी रिटायरमेंट बेनिफिट्स को भी अभी तक रोका हुआ है।

मुद्दे जो आज भी गंभीरता से उठते हैं:- 

  1. पहला सवाल है कि क्या बड़े बैंकों में पारदर्शिता और जवाबदेही की पर्याप्त व्यवस्था होती है या नहीं ?
  2. दूसरा सवाल है कि क्या उच्च पदस्थ अधिकारियों के निजी हितों की निगरानी के लिए पर्याप्त ढांचे वर्तमान में मौजूद हैं या नहीं ?
  3. आरबीआई, सेबी जैसी संस्थाओं की समय रहते हस्तक्षेप क्यों नहीं किया जाता ?
  4. क्या इस प्रकरण से महिलाओं के कॉरपोरेट नेतृत्व पर अविश्वास बहुत तेजी से बढ्ने कि उम्मीद की जा सकती है।

इसका निष्कर्ष: एक चेतावनी होगी या भविष्य के लिए सीख

चंदा कोचर का अर्श से फर्श तक का सफर एक दुखद लेकिन जरूरी चेतावनी को भी दर्शाता है, इससे स्पष्ट है कि ईमानदारी और पारदर्शिता से बड़ा कोई ओहदा नहीं हो सकता। उनके खिलाफ ट्रिब्यूनल की यह टिप्पणी, इस बात को भी प्रमाणित करता है कि भारत में वित्तीय अपराधों को अब पहले की तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

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