कनाडा में खालिस्तान आंदोलन का इतिहास बहुत पुराना है, 1984 का इतिहास, 40 साल से भी पुराना है इतिहास। जाने विस्तार से।
कनाडा में खलिस्तान का इतिहास:-
कनाडा में खालिस्तान आंदोलन की जड़ें 1980 के बाद में पड़ीं। कनाडा में खालिस्तान आंदोलन भारत में पंजाब राज्य को एक अलग सिख राष्ट्र खालिस्तान देश की मांग से जुड़ा है। खलिस्तान की उत्पत्ति भारत में हुई थी, लेकिन धीरे धीरे इसका असर कनाडा, ब्रिटेन, अमेरिका जैसे देशों में बसे सिख समुदायों में भी देखने को मिलने लगा। कनाडा में खालिस्तान आंदोलन की उपस्थिति और विस्तार एक कठोर राजनीतिक प्रक्रिया का परिणाम है, जिसे विस्तार से समझने के लिए ऐतिहासिक, सामाजिक और राजनीतिक दृष्टिकोण से विश्लेषण करना की आवश्यकता है।
खलिस्तान की प्रारंभिक जड़ें: 1970 और 1980 का दशक
सन 1970 और 1980 के दशक में भारत में सिख समुदाय एक समूह में यह भावना पनपने लगी कि उन्हें जो राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक अधिकार मिलने चाहिए वह नहीं मिल रहे हैं। पंजाब में बढ़ती राजनीतिक अस्थिरता, धार्मिक कट्टरता और कुछ नेताओं द्वारा उकसाई गई अलगाववादी विचारधारा ने “खालिस्तान” नामक एक काल्पनिक राष्ट्र या देश की मांग को जन्म दिया था।
भिंडरावाले की रही विशेष भूमिका:
प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के कार्यकाल के समय संत जरनैल सिंह भिंडरावाले, जो एक प्रभावशाली धार्मिक नेता थे, उन्होंने सिख समुदाय के बीच धार्मिक जागरूकता और राजनीतिक अधिकारों के लिए आवाज उठानी प्रारम्भ की। हालांकि उनके इरादों को लेकर इतिहासकारों में मतभेद हैं, लेकिन जरनैल सिंह के नेतृत्व में कुछ कट्टरपंथियों ने खालिस्तान की मांग को एक राजनीतिक आंदोलन में बदलकर रख दिया।
अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में ऑपरेशन ब्लूस्टार (1984):
प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के आदेश पर जून 1984 में भारतीय सेना द्वारा अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में चलाए गए ऑपरेशन ब्लूस्टार ने खालिस्तान आंदोलन को एक अंतरराष्ट्रीय स्तर का मुद्दा बना दिया। इसके पश्चात प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गयी और फिर दिल्ली में हुए सिख विरोधी दंगे ने इस आंदोलन को और भी उग्र रूप दे दिया था।
कनाडा में खालिस्तानी आंदोलन की विचारधारा का फैलना:-
कनाडा में बड़ी संख्या मेंभारत से गए पंजाबी मूल के सिख प्रवासी रहते हैं, कनाडा में विशेषकर ब्रिटिश कोलंबिया और ओंटारियो प्रांतों में सिख समुदाय सबसे ज्यादा है। 1980 के दशक में जब भारत में खालिस्तान आंदोलन अपने चरम पर था, उसी समय बड़ी संख्या में सिख समुदाय के लोग भारत छोड़कर कनाडा और अन्य पश्चिमी देशों में बसने लगे थे। इनमें से ही कुछ लोग खालिस्तान की मांग की अपनी विचारधारा को कनाडा भी ले आए थे।
एयर इंडिया 182 में हुए विस्फोट (1985):
कनाडा में खालिस्तानी गतिविधियों के बढ़ते मामलों का सबसे दुखद और कुख्यात उदाहरण 1985 का एयर इंडिया फ़्लाइट 182 विस्फोट था, जिसमें 329 लोगों की मौत हो गई थी। यह घटना कनाडा की धरती पर सबसे बड़ा आतंकवादी हमला था, जिसने कनाडा की धरती पर सबको झकझोर कर रख दिया था। इस घटना को कनाडा स्थित खालिस्तानी आतंकियों ने अंजाम दिया था। इस दुखद घटना ने कनाडा सरकार और जनता को झकझोर दिया था।
कनाडा में रह रहे सिख समुदाय में विचारधारा का विभाजन:-
कनाडा में बसा सिख समुदाय दो विचारधारा में बंट गया था। एक वह जो खालिस्तान आंदोलन और भारत से अलग खालिस्तान देश का समर्थन करता था और दूसरा वह जो इसे भारत विरोधी और हिंसा पर आधारित समझता था यानि भारत के समर्थन में था।
कनाडा में गुरुद्वारे और राजनीति परिदृश्य:-
कनाडा की धरती पर कई गुरुद्वारे खालिस्तानी समर्थकों के प्रभाव में आ गए थे। इन गुरुद्वारों के माध्यम से ही आर्थिक सहायता, विचारधारात्मक प्रचार और राजनीतिक लॉबिंग की जाने लगी थी। कुछ खालिस्तानी समर्थकों ने गुरुद्वारों को भी राजनीतिक मंच के रूप में इस्तेमाल किया।
कनाडा में स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता:
कनाडा का संविधान लोगों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है। इस अधिकार का लाभ उठाते हुए कई खालिस्तानी समर्थकों ने जनसभाएं, प्रदर्शनों और मीडिया के माध्यम से अपनी मांगें सार्वजनिक मंचों पर रखनी प्रारम्भ की।
कनाडा की सरकार और खालिस्तान पर स्थिति
कनाडा की सरकार ने कई बार खालिस्तानी गतिविधियों पर अंकुश लगाने का प्रयास किया, लेकिन इसे धार्मिक स्वतंत्रता, समुदायिक राजनीति और वोटबैंक की राजनीति से भी जोड़ा जाता रहा है।
जस्टिन ट्रूडो सरकार की आलोचना का कारण:
कनाडा के पूर्व प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो की लिबरल पार्टी पर अक्सर यह आरोप लगता रहा है कि वह खालिस्तानी समर्थकों को राजनीतिक रूप से संरक्षण प्रदान करती है, जैसा कि पिछले दिनों उन्होने उन्होंने भारत यात्रा के दौरान खालिस्तानी समर्थक जसपाल अटवाल को मिलने के लिए आमंत्रित किया था।
खालिस्तानियों का समर्थन करने से भारत-कनाडा संबंधों पर असर:
कनाडा में लगातार बढ़ती खालिस्तानियों की सक्रियता भारत और कनाडा के रिश्तों में कई बार तनाव का कारण बनी। भारत सरकार ने अब तक कनाडा की सरकार से कई बार ऐसे तत्वों पर कार्रवाई की मांग की है।
हाल के वर्षों की स्थिति
पिछले कुछ वर्षों में कनाडा की धरती पर खालिस्तानी तत्व सोशल मीडिया, जनसभाओं और पोस्टर अभियानों के जरिए फिर से सक्रिय हो रहें हैं।
निज्जर की हत्या (2023):
सन 2023 में कनाडा में खालिस्तानी नेता हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के बाद से ही एक नया विवाद खड़ा हो गया था। कनाडा ने आरोप लगाया था कि इसमें भारत सरकार की संलिप्तता अवश्य है, जिससे दोनों देशों के सम्बन्धों में खटास आ गयी थी। यह आरोप बिना ठोस सबूतों के लगाया गया था, जिससे ट्रूडो सरकार की नीयत पर सवाल उठने लाज़मी थे।
हालिया चुनाव में कोर्नी और खालिस्तान समर्थकों की हार
हाल ही में (2025 के चुनाव) में लिबरल पार्टी ने मार्क कार्नी के नेतृत्व में जीत दर्ज की है और खालिस्तान समर्थक नेताओं और उम्मीदवारों को जनता ने नकार दिया है। इससे साफ संकेत है कि कनाडा की आम जनता अब चरमपंथी विचारधाराओं से दूर रहना चाहती है। साथ ही, सिख समुदाय के बीच भी यह धारणा बन रही है कि धर्म के नाम पर हिंसा और अलगाववाद का समर्थन करना गलत है।
निष्कर्ष:-
कनाडा में खालिस्तान आंदोलन की जड़ें ऐतिहास में हुई घटनाओं, भारत में हुई राजनीतिक उथल-पुथल के साथ और प्रवासी सिख समुदाय की भावनाओं से जुड़ी हुई रही हैं। हालांकि इसकी सक्रियता समय के साथ घटती-बढ़ती रही है, लेकिन यह कहना गलत नहीं होगा कि कनाडा के बहुलवादी समाज यानि ईसाई समाज में खालिस्तानी विचारधारा को अब व्यापक जनसमर्थन नहीं है। हाल के चुनाव में खालिस्तान समर्थकों की हार इसका जीता जागता प्रमाण है।
कनाडा को अब चाहिए कि वह धार्मिक स्वतंत्रता और राष्ट्रहित के बीच संतुलन बनाकर चरमपंथी विचारधारों पर लगाम लगाए, जिससे दोनों देशों के रिश्ते मजबूत हों और कनाडा का सामाजिक ताना-बाना सुरक्षित बना रहे।