14th Dalai Lama: 14वें दलाई लामा का चीन के खिलाफ बहुत लंबा संघर्ष और दलाई लामा के भारत आने की कहानी। जाने विस्तार से। Always Good or bad.
तिब्बत के 14वें धर्मगुरु दलाई लामा का जीवन परिचय और तिब्बत पर कैसे हुआ चीन का कब्जा:-
14वें दलाई लामा का जीवन परिचय पर एक नजर:-
दलाई लामा का नाम और जन्म:-
14वें दलाई लामा का असली नाम ल्हामो थोंडुप “Lhamo Thondup” है। Dalai Lama का जन्म 6 जुलाई 1935 को ताकस्तेर गाँव, अम्दो क्षेत्र, तिब्बत जो अब चीन के चिंगहाई प्रांत में है, में हुआ था। यह क्षेत्र तिब्बत का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता था। इनके परिवार की आर्थिक स्थिति सामान्य से थोड़ी नीचे थी और उनके पिता किसान थे।
Dalai Lama की पहचान और चयन प्रक्रिया किस प्रकार होती है:-
13वें दलाई लामा की वर्ष 1933 में मृत्यु हो गई थी, जिसके बाद तिब्बती बौद्ध परंपरा के अनुसार उनके पुनर्जन्म की खोज शुरू की गयी। उच्च लामाओं ने चिन्हों, सपनों और पारंपरिक धार्मिक विधियों से ल्हामो थोंडुप को वर्ष 1939 में 14वें दलाई लामा के रूप में पहचाना और उन्हे इस पद पर बैठा दिया। उन्हें मात्र चार वर्ष की आयु में ही धर्मगुरु घोषित कर दिया गया और फिर ल्हासा, तिब्बत लाया गया, जहाँ उन्हें ‘तेनज़िन ग्यात्सो’ यानि Tenzin Gyatso नाम दिया गया।
Dalai Lama की धार्मिक और शैक्षणिक शिक्षा का संक्षिप्त परिचय:-
14वें दलाई लामा को बहुत कम उम्र में ही बौद्ध दर्शन, तर्कशास्त्र, चिकित्सा, संस्कृत, ज्योतिष और तांत्रिक साधनाओं की पूर्ण शिक्षा दी गई थी। उन्होंने मात्र 23 वर्ष की आयु में ही गेशे की उपाधि धारण की थी, जो कि बौद्ध दर्शन में पीएचडी डिग्री के समान मानी जाती है।
तिब्बत पर चीन का कब्जा कैसे और कब हुआ:-
तिब्बत का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य पर एक नजर:-
प्राचीन समय से ही तिब्बत एक स्वतंत्र बौद्ध राष्ट्र के रूप में रहा है, जिसकी राजधानी ल्हासा, जो अब चीन में है, थी। यद्यपि उस समय चीन और मंगोल शासन ने तिब्बत पर काफी राजनीतिक प्रभाव डाला था, लेकिन तिब्बत ने अपनी स्वायत्तता हमेशा बनाए रखी। वर्ष 1912 की चीनी क्रांति के बाद से ही तिब्बत ने खुद को स्वतंत्र घोषित कर लिया था और लगभग 40 वर्षों तक स्वतंत्र राष्ट्र बनकर रहा भी।
चीन द्वारा तिब्बत पर कब्जा कैसे किया गया (1949-1951):-
1. तिब्बत की पृष्ठभूमि:-
वर्ष 1949 में चीन में माओ त्से तुंग के नेतृत्व में कम्युनिस्ट सरकार की स्थापना की गयी थी। इसके तुरंत बाद ही चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने तिब्बत को मातृभूमि का अभिन्न अंग बताना शुरू किया और तिब्बत में अपनी सेना भेजने का निर्णय लिया।
2. वर्ष 1950 में तिब्बत पर चीनी सेना का आक्रमण:-
अक्टूबर 1950 में, चीन की चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी यानि PLA ने तिब्बत पर बड़ा आक्रमण किया और तिब्बत के चाम्डो क्षेत्र पर चीन ने कब्जा कर लिया। तिब्बत की सेना चीन की तुलना में काफी कमजोर और कम संख्या में थी, इसलिए वह ज्यादा समय तक चीन की सेना का सामना नहीं कर सकी और जल्द ही उसने समर्पण कर दिया।
3. वर्ष 1951 में तिब्बत का चीन के साथ 17-सूत्री समझौता हुआ:-
चीन ने तिब्बती प्रतिनिधियों पर अपना दबाव डालकर 23 मई 1951 को तिब्बत के साथ एक समझौता करवाया जिसे आज 17 Point Agreement कहा जाता है इस समझौते में चीन ने तिब्बत को स्वायत्त क्षेत्र मानने की बात तो की और साथ ही कहा कि वह तिब्बत की धार्मिक स्वतंत्रता और दलाई लामा की भूमिका को भविष्य में बनाए रखेगा। लेकिन यह समझौता चीन द्वारा हथियारों के दबाव में किया गया था और तिब्बत सरकार ने इसे कभी पूर्णरूप से स्वीकृत नहीं किया था।
तिब्बत में विद्रोह हुए और दलाई लामा का निर्वासन हुआ:-
वर्ष 1950 के दशक में तिब्बत में असंतोष बढ़ा:-
चीन द्वारा तिब्बत में उनकी पारंपरिक संस्कृति, धर्म और प्रशासन में तेजी से दखल होने लगा, जिस कारण तिब्बती जनता में असंतोष बढ़ने लगा। चीन द्वारा भूमि सुधारों के नाम पर मठों और धार्मिक संस्थानों को जमकर निशाना बनाया गया। लाखों बौद्ध भिक्षुओं को कठोर यातनाएं दी गईं।
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वर्ष 1959 में तिब्बत के ल्हासा में विद्रोह हुआ और दलाई लामा का वहाँ से पलायन करना पड़ा:-
10 मार्च 1959 को तिब्बत के ल्हासा में चीन विरोधी एक बड़ा जनविद्रोह हुआ था। जिसमे लाखों लोगों ने दलाई लामा की सुरक्षा की मांग की थी। लेकिन चीन ने इस विद्रोह को अपनी क्रूरता से दबाया और हजारों लोग मार दिये गए। वहाँ की स्थिति बिगड़ती देख, दलाई लामा ने भिक्षु-वेश में भेष बदलकर 17 मार्च 1959 को तिब्बत को छोड़ दिया और भारतीय सीमा की ओर चल पड़े थे।
भारत में 14वें dalai lama को शरण:-
31 मार्च 1959 को दलाई लामा ने भारत में प्रवेश किया और प्रधानमंत्री नेहरू द्वारा उन्हें शरण दी गई थी। भारत सरकार ने धर्मशाला, हिमाचल प्रदेश में उन्हें और तिब्बती निर्वासित सरकार को स्थान दे दिया। धर्मशाला से आज भी Central Tibetan Administration यानि CTA अपना कार्य करती है, जो तिब्बत की निर्वासित सरकार के रूप में आज भी मानी जाती है।
14वें धर्मगुरु दलाई लामा की वैश्विक भूमिका और मानवीय संदेश का संक्षिप्त परिचय:-
dalai lama शांति और अहिंसा के प्रतीक माने जाते हैं:-
14वें धर्मगुरु दलाई लामा ने तिब्बत की स्वतंत्रता के लिए कभी हथियार न उठाए और न उठाने दिये। वे हमेशा ही महात्मा गांधी के अहिंसा के मार्ग पर चलते रहे। उन्होंने तिब्बत के लिए बीच का रास्ता अपनाया जिसमें पूर्ण स्वतंत्रता नहीं, बल्कि चीन के भीतर सार्थक स्वायत्तता की मांग की आज भी की जा रही है।
कब मिला नोबेल शांति पुरस्कार:-
वर्ष 1989 में dalai lama को नोबेल शांति पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। यह पुरस्कार उन्हें अहिंसा, मानवाधिकार और तिब्बत के शांतिपूर्ण संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए मिला था।
Dalai लामा का धार्मिक नेतृत्व:-
14वें Dalai Lama बौद्ध धर्म के सबसे बड़े प्रचारक माने जाते हैं। वे वैश्विक स्तर पर भी करुणा, सहिष्णुता, धार्मिक सह-अस्तित्व और पर्यावरण सुरक्षा जैसे गंभीर मुद्दों पर हमेशा कार्य करते रहें हैं।
इसका निष्कर्ष:-
14वें Dalai Lama न केवल तिब्बत के धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीक माने जाते हैं, बल्कि वे शांति और मानवता के वैश्विक प्रतीक भी बन चुके हैं। तिब्बत पर चीन का कब्जा एक ऐतिहासिक अन्याय के रूप में देखा जाता रहा है, जिसके खिलाफ तिब्बत का संघर्ष आज भी जारी है। हालांकि तिब्बती आंदोलन ने अहिंसा का मार्ग हमेशा ही अपनाया है, लेकिन यह एक गहरी मानवाधिकार की लड़ाई भी काही जा सकती है जो अभी भी समाधान की प्रतीक्षा में लगी हुई है। तिब्बत को उसका क्षेत्र चीन द्वारा मिलना ही चाहिए। संयुक्त राष्ट्र जैसे बड़े संगठनों को सामने आकार चीन का विरोध करना चाहिए और तिब्बत वापस न होने तक चीन का बहिष्कार कर देना चाहिए ताकि चीन घुटनों पर आ जाये।
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