2025: लिपुलेख पर भारत और नेपाल का विवाद एक बार फिर सुर्खियों में। जाने क्या है मामला? Always Right or Wrong.

लिपुलेख को लेकर भारत और नेपाल में फिर विवाद:-

भारत और नेपाल के बीच संबंध ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक दृष्टि से काफी मजबूत रहे हैं। दोनों देशों की सीमाएँ एक-दूसरे के लिए खुली हैं और लोगों के बीच आपसी रिश्ते भाईचारे पर ही आधारित हैं। लेकिन इन घनिष्ठ रिश्तों के बावजूद समय-समय पर देखा गया है कि कुछ सीमा विवाद भी उभरते रहते हैं। इनमें सबसे प्रमुख विवाद लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा क्षेत्र को लेकर वर्तमान में है। हाल ही में एक बार फिर लिपुलेख का मुद्दा चर्चा में बना हुआ है, जब नेपाल ने भारत के कदमों पर अपनी आपत्ति जताई और इस क्षेत्र को अपने नक्शे में दिखाया था। इस विवाद की जड़ें औपनिवेशिक दौर के समझौतों और मानचित्रों में छिपी हुई हैं, लेकिन वर्तमान राजनीति और कूटनीति ने इसे और जटिल भी बना दिया है।

भारत और नेपाल में लिपुलेख विवाद
भारत और नेपाल में लिपुलेख विवाद

दोनों देशों की भौगोलिक स्थिति और महत्व:-

लिपुलेख दर्रा उत्तराखंड राज्य के पिथौरागढ़ जिले में स्थित है और यह भारत, नेपाल तथा चीन (तिब्बत) की त्रि-जंक्शन पर है। यह क्षेत्र सामरिक और रणनीतिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारत-चीन व्यापार मार्ग के रूप में ऐतिहासिक रूप से प्रयोग होता आ रहा है। कैलाश मानसरोवर यात्रा का प्रमुख मार्ग भी यहीं से होकर गुजरता है और यह दर्रा भारत की सुरक्षा व्यवस्था के लिहाज से भी बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि चीन के साथ सीमा विवाद की संवेदनशीलता इस क्षेत्र को और अधिक महत्वपूर्ण बना देती है।

भारत इस क्षेत्र को अपने राज्य उत्तराखंड का हिस्सा मानता है, जबकि नेपाल का अपना दावा है कि यह उसके धामी-चंपावत जिले का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

भारत और नेपाल में लिपुलेख विवाद

भारत-नेपाल के विवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर एक नजर:-

  1. वर्ष 1814-1816 के एंग्लो-नेपाल युद्ध के बाद नेपाल और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच यह प्रमुख संधि हुई। इस संधि के तहत काली नदी को भारत और नेपाल की सीमा माना गया था। समस्या यह है कि काली नदी की उत्पत्ति कहाँ से हुई, इस पर दोनों देशों की व्याख्या अलग-अलग रही है।
  2. भारत का मानना है कि काली नदी का उद्गम लिपुलेख के पास ही नहीं, बल्कि कैलापानी से आगे तक भी है। इस आधार पर लिपुलेख भारत का हिस्सा है और रहेगा।
  3. नेपाल का मानना है कि नदी की उत्पत्ति लिम्पियाधुरा से हुई थी और अगर ऐसा माना जाए तो लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा उसके क्षेत्र में ही आते हैं।
भारत और नेपाल में लिपुलेख विवाद

भारत-नेपाल विवाद का ताज़ा घटनाक्रम:-

  • साल 2015 में भारत और चीन ने लिपुलेख दर्रे से होकर व्यापार मार्ग खोलने का समझौता किया था। नेपाल ने इसका विरोध खुलकर विरोध किया, क्योंकि उसे इसमें शामिल नहीं किया गया था।
  • साल 2019 में जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के पुनर्गठन के बाद भारत ने अपना नया राजनीतिक नक्शा जारी किया, जिसमें कालापानी क्षेत्र को उत्तराखंड का हिस्सा दिखाया गया था। नेपाल ने इस पर अपना कड़ा रुख जताया।
  • साल 2020 में भारत ने लिपुलेख से मानसरोवर तक सड़क का उद्घाटन किया था। नेपाल ने इसे अपनी संप्रभुता का उल्लंघन कहा और संसद में नया नक्शा जारी कर दिया, जिसमें कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख को अपने क्षेत्र में शामिल किया गया था।
  • वर्ष 2023-24 के समय में नेपाल ने फिर से इस मुद्दे को जीवित किया और भारत से सीमा वार्ता की मांग फिर से उठायी।
भारत और नेपाल में लिपुलेख विवाद

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भारत और नेपाल में लिपुलेख विवाद

भारत और नेपाल के समाधान की मुख्य संभावनाएँ:-

  1. दोनों देशों की कूटनीतिक वार्ता:
    • भविष्य में भारत और नेपाल को बातचीत के जरिए एक स्पष्ट सीमा रेखा तय करनी होगी।
  2. संयुक्त सर्वेक्षण की आवश्यकता:
    • दोनों देशों के तकनीकी दल मिलकर आधुनिक तकनीक (GPS और सैटेलाइट) की मदद से सीमा का सर्वेक्षण सही प्रकार से भी कर सकते हैं।
  3. राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता:
    • दोनों देशों की सरकारों को आंतरिक राजनीति से ऊपर उठकर समाधान को खोजने की आवश्यकता होगी।
  4. जनसंपर्क और विश्वास बहाली की ओर:
    • भारत-नेपाल के सांस्कृतिक और पारिवारिक रिश्तों को आधार बनाकर विवाद का शांतिपूर्ण निपटारा होना चाहिए।

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इसका निष्कर्ष:-

लिपुलेख विवाद केवल भौगोलिक नहीं बल्कि ऐतिहासिक, राजनीतिक और सामरिक महत्व का मुद्दा भी दोनों देशों के लिए बना हुआ है। भारत और नेपाल के बीच गहरे संबंध इस विवाद से कमजोर नहीं होने चाहिए, यह भी ध्यान रखने की आवश्यकता है। यदि दोनों देश इसे समझदारी, धैर्य और कूटनीतिक बातचीत के जरिए हल करने का प्रयास करें, तो यह न केवल सीमा विवाद का हर प्रकार से अंत होगा, बल्कि भारत-नेपाल संबंधों को और अधिक मजबूत भी बनाएगा। अंततः, दोनों देशों को यह भी समझना होगा कि सीमा विवाद का समाधान टकराव से बिलकुल नहीं निकल सकता, बल्कि आपसी विश्वास और सहयोग से ही समाधान संभव है।

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